Wednesday, March 6, 2024

शिव रुद्राष्टकम नमामीशमीशान निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌

        शिव रुद्राष्टकम

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं
गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌
करालं महाकाल कालं कृपालुं
गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌
स्फुरन्मौलि कल्लो लिनी चारू गंगा
लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि
प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌
त्रय: शूल निर्मू लनं शूल पाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
 
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सच्चिदानन्द दाता पुरारी
चिदानन्द सन्दोह मोहाप हारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणम्‌
न तावत्सुखं शांति सन्ताप नाशं
प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं
 
न जानामि योगं जपं नैव पूजा
न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभोपाहि आप न्नमामीश शम्भो
प्रभोपाहि आप न्नमामीश शम्भो
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌
 
रूद्राष्टकमिदं प्रोक्तं
विप्रेण हरतोषये
ये पठन्ति नरा भक्त्या
तेषां शंभो प्रसीदति





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